Tuesday, January 25, 2011

जागृति


आँखों ने आँखों को जो सपना दिखाया है देखो कहीं टूट जाये ना,

किनारों को चूने से पहले समंदर कहीं लौट जाये ना .

अरमान जो जगाये थे वीरो ने शीत पड़ जाये ना

स्वतंत्रता का तिरंगा कहीं हो ना जाये मजबूर

सफलता का काफिला कहीं निकल ना जाये दूर

क्यूँ नहीं तोड़ रहे जंजीर

क्यूँ ही जकड़े हो खुद ही अपनी तकदीर

संगीत से बोल रही में अपनी जुबान

जाग ए जवान

जग ए हिन्दुस्तां

हम हैं आगामी नीव उस नवजीवन की

जो किलकारी में गा रहा है उदय बचपन का

किरणों को पकड़ चढ़ जा रथ पर

छू ले इठलाते आसमान को लपककर

ये झूमती हवाएं राह निकल रही हमरे लिए

इनके आगोश में खुद को गवांकर चुनिए

बुलबुला जो पहुंचाए सतह तक

अगर जगाया है खुद को को तो में ना लिखूंगी

पर फिर भी तब तक कोशिश करुँगी

जब तक जीर्ण शीर्ण कंकाल की बिलखती आत्मा की करूँ कराह

ना पहुंचा दूँ उन बधिरों तक

जो मदमस्त हैं सूक्ष्म सफलता की चाह में

और उठ खड़े हों भारत के

यौवन के मृदंग नाच पर

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